गंगा स्नान बिना जीवन है अपूर्ण, समाजसेविका मनीषा बत्रा ने दी गंगा दशहरा की सभी को शुभकामनाएं और बधाई ,इस अवसर पर उन्होंने रुड़की को कुंभ क्षेत्र में शामिल कराए जाने की उठाई मांग

 

रुड़की ।     समाज सेविका मनीषा बत्रा ने गंगा दशहरा पर क्षेत्रवासियों को शुभकामनाएं और बधाई दी है। इस अवसर पर उन्होंने रुड़की को कुंभ क्षेत्र में शामिल कराए जाने की मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि रुड़की विधायक, हरिद्वार के सांसद और अन्य जनप्रतिनिधियों को रुड़की को कुंभ क्षेत्र में शामिल कराए जाने के लिए ठोस प्रयास करने चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक रुड़की कुंभ क्षेत्र में शामिल नहीं होगा। तब तक यहां का संपूर्ण विकास नहीं हो सकेगा। आध्यात्मिक, धार्मिक पर्यटन और सामाजिक दृष्टि से रुड़की हरिद्वार कुंभ क्षेत्र का हिस्सा है। समाजसेवी का मनीषा बत्रा ने कहा है कि आज गंगा दशहरा है सभी मां गंगा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पूजा पाठ कर रहे हैं। रुड़कीवासियों के लिए भी यह बड़े ही सौभाग्य की बात है कि गंगा की धारा शिक्षा नगरी के मध्य होकर बह रही है। उन्होंने कहा है कि राजा भगीरथ के कठोर तप से प्रसन्न होकर उनके पुरखों की मुक्ति के लिए ब्रह्मा जी के कमंडल से निकलकर भगवान शिव की जटाओं से होती हुईं धरती पर अवतरित हुई। गंगा दशहरा पर सूर्यवंशी राजा भगीरथ का पीडिय़ों का परिश्रम व तप सफल हुआ और हम धरतीवासियों को मां गंगा का अनुपम वरदान मिला। मां गंगा हम भारतीयों को राष्ट्रीय एकता के सूत्र में पिरोती हैं। आर्य-अनार्य, वैष्णव-शैव सभी ने एक स्वर में इसके महत्त्व को स्वीकार किया है। जीवन में एक बार भी गंगा में स्नान न कर पाना जीवन की अपूर्णता का द्योतक माना जाता है।

श्रीहरि के अंगूठे से निकास
ऋग्वेद, अथर्ववेद, ब्राह्ममण ग्रंथों के साथ रामायण, महाभारत तथा स्कन्द पुराण में पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरितश्रेष्ठा एवं महानदी के रूप में गंगा मैया का यशोगान मिलता है। इनमें सर्वाधिक व्यापक पौराणिक मान्यता गंगा के श्रीहरि विष्णु के पैर के अंगूठे से निकलने की है। गंगोत्पत्ति से जुड़ी एक अन्य कथा के मुताबिक भगवान विष्णु द्वारा वामन रूप में राक्षसराज बलि से त्रिलोक को मुक्त करने की खुशी में ब्रह्मदेव ने भगवान विष्णु के चरण धोए और इस जल को अपने कमंडल में भर लिया। इसी कमंडल के जल से गंगा का जन्म हुआ और वे स्वर्ग नदी के रूप में देवलोक को तृप्त करने लगीं। प्राचीन वैदिक ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है कि स्वर्ग नदी गंगा धरती (मृत्युलोक) आकाश (देवलोक) व रसातल (पाताल लोक) को अपनी तीन मूल धाराओं भागीरथी, मन्दाकिनी और भोगावती के रूप में अभिसिंचित करती हैं।

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