गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है,इस दिन स्वर्ग से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ, इसलिए यह महापुण्यकारी पर्व माना गया

 

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रुड़की ।     श्रष्टि के निर्माता ब्रह्मा जी के कमंडल से राजा भागीरथ द्वारा देवी गंगा को धरती पर अवतार दिवस को गंगा दशहरा के नाम से जाना जाता है। पृथ्वी पर अवतार से पहले गंगा नदी स्वर्ग का हिस्सा थीं। गंगा दशहरा के दिन भक्त देवी गंगा की पूजा करते हैं और गंगा में डुबकी लगाते हैं, और दान-पुण्य, उपवास, भजन और गंगा आरती का आयोजन करते हैं।गंगा दशहरा पर करोड़ों भक्त हरिद्वार ऋषिकेश प्रयाग राज गढ़मुकेश्वर,, वाराणसी, पटना और गंगासागर में पवित्र डुबकी लेते हैं। दशाश्वमेध घाट वाराणसी और हर की पौरी हरिद्वार की गंगा आरती विश्व प्रसिद्ध है। यमुना नदी के पास बसे पौराणिक शहर जैसे मथुरा, वृंदावन और बेटेश्वर में भी भक्त आज के दिन यमुनाजी को गंगा मैया मानकर स्नान करते हैं। भक्तों द्वारा लस्सी, शरबत, शिकंजी जैसे पेय पदार्थ तथा जेलबी, मालपुआ, खीर और फल तरबूज जैसी मिठाइयाँ भी वितरित की जाती हैं। धर्माचार्यों के मुताबिक गंगा दशहरे के दिन सुबह सूर्योदय से पहले जगना चाहिए और फिर हो सके तो निकट के गंगा तट पर जाकर स्‍नान करना चाहिए। अगर आप गंगा नदी में स्‍नान करने में असमर्थ हैं तो अपने शहर की ही किसी नदी में स्‍नान कर सकते हैं। यदि यह भी संभव न हो सके तो घर में नहाने के जल में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर स्‍नान कर लें।

गंगा दशहरा पर स्नान के दौरान ‘ऊँ नम: शिवाय नारायण्यै दशहराय गंगाय नम:’ मंत्र का जप करना चाहिए। इसके बाद ‘ ऊँ नमो भगवते एं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय स्वाहा’ मंत्र का भी जप करें और जप करते हुए 10 फूल अर्पित करें। पूजा में जिस भी सामग्री का प्रयोग वह संख्‍या में 10 होनी चाहिए। जैसे 10 दीये, 10 तरह के फूल, 10 दस तरह के फल आदि।

गंगा दशहरा के पर्व पर दान-पुण्‍य का भी विशेष महत्‍व माना जाता है। गंगा दशहरा पर शीतलता प्रदान करने वाली वस्‍तुओं को दान करने का विशेष महत्‍व बताया गया है। इनमें आप ठंडे फल, पंखा, मटका, सत्‍तू को दान करने के लिए प्रयोग में ला सकते हैं। इस दिन घर में भगवान सत्‍यनारायण की कथा करवाने का भी विशेष महत्‍व माना जाता है।

पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि भगीरथ ऋषि ने अपने पूर्वजों की मोक्ष प्राप्ति के लिए कठोर तपस्‍या की थी और उसके बाद अपने अथक प्रयासों के बल पर मां गंगा को धरती पर लाने में सफल हुए थे। लेकिन मां गंगा का वेग इतना अधिक था कि अगर वह सीधे धरती पर आतीं तो पाताल में ही चलीं जातीं। भक्‍तों के विनती करने पर भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में भर लिया और उन्हें उसके बाद मां गंगा कैलाश से होते हुए धरती पर पहुंची और भगीरथ के पूर्वजों का उद्धार किया।

आचार्य पंडित राकेश कुमार शुक्ला,रुड़की।

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